वन पर्व  अध्याय २६५

मार्कण्डेय़ उवाच

क्षीय़तां दुष्कृतं कर्म वनवासकृतं तव |  १६   क
भार्या मे भव सुश्रोणि यथा मन्दोदरी तथा ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति