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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
मा च तेऽस्तु भय़ं भीरु रावणाल्लोकगर्हितात् |  ५८   क
नलकूवरशापेन रक्षिता ह्यस्यनिन्दिते ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति