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शान्ति पर्व
अध्याय २६४
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भीष्म उवाच
ततस्तु यज्ञे सावित्री साक्षात्तं संन्यमन्त्रय़त् |  १०   क
निमन्त्रय़न्ती प्रत्युक्ता न हन्यां सहवासिनम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति