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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
भर्त्सय़ित्वा तु रूक्षेण स्वरेण गतचेतनाम् |  ४०   क
मूर्धजेषु निजग्राह खमुपाचक्रमे ततः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति