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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
इति सा तं समाभाष्य प्रविवेशाश्रमं पुनः |  ३९   क
तामनुद्रुत्य सुश्रोणीं रावणः प्रत्यषेधय़त् ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति