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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र त्वं वरनारीषु शोभिष्यसि मय़ा सह |  ३४   क
भार्या मे भव सुश्रोणि तापसं त्यज राघवम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति