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शान्ति पर्व
अध्याय २६०
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कपिल उवाच
देवय़ाना हि पन्थानश्चत्वारः शाश्वता मताः |  १४   क
तेषां ज्याय़ःकनीय़स्त्वं फलेषूक्तं वलावलम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति