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शल्य पर्व
अध्याय २६
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सञ्जय़ उवाच
पार्थोऽपि युधि विक्रम्य कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |  ३३   क
शूराणामश्वपृष्ठेभ्यः शिरांसि निचकर्त ह ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति