अनुशासन पर्व  अध्याय २६

अङ्गिरा उवाच

महाह्रद उपस्पृश्य शुद्धेन मनसा नरः |  ४५   क
एकमासं निराहारो जमदग्निगतिं लभेत् ||  ४५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति