अनुशासन पर्व  अध्याय २६

अङ्गिरा उवाच

मरुद्गण उपस्पृश्य पितॄणामाश्रमे शुचिः |  ३७   क
वैवस्वतस्य तीर्थे च तीर्थभूतो भवेन्नरः ||  ३७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति