वन पर्व  अध्याय २५५

वैशम्पाय़न उवाच

भार्याभिहर्ता निर्वैरो यश्च राज्यहरो रिपुः |  ४६   क
याचमानोऽपि सङ्ग्रामे न स जीवितुमर्हति ||  ४६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति