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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
शिविसिन्धुत्रिगर्तानां विषादश्चाप्यजाय़त |  ३   क
तान्दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रान्व्याघ्रानिव वलोत्कटान् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति