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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
स भिन्नहृदय़ो वीरो वक्त्राच्छोणितमुद्वमन् |  १४   क
पपाताभिमुखः पार्थं छिन्नमूल इव द्रुमः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति