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वन पर्व
अध्याय २५४
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द्रौपद्यु उवाच
मृदुर्वदान्यो धृतिमान्यशस्वी; जितेन्द्रिय़ो वृद्धसेवी नृवीरः |  १२   क
भ्राता च शिष्यश्च युधिष्ठिरस्य; धनञ्जय़ो नाम पतिर्ममैषः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति