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शान्ति पर्व
अध्याय २५४
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भीष्म उवाच
ऋषय़ो यतय़ो ह्येतन्नहुषे प्रत्यवेदय़न् |  ४६   क
गां मातरं चाप्यवधीर्वृषभं च प्रजापतिम् |  ४६   ख
अकार्यं नहुषाकार्षीर्लप्स्यामस्त्वत्कृते भय़म् ||  ४६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति