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वन पर्व
अध्याय २५३
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वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तु गोमाय़ुरनल्पघोषो; निवर्ततां वाममुपेत्य पार्श्वम् |  ७   क
प्रव्याहरत्तं प्रविमृश्य राजा; प्रोवाच भीमं च धनञ्जय़ं च ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति