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वन पर्व
अध्याय २५२
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वैशम्पाय़न उवाच
सरोषरागोपहतेन वल्गुना; सरागनेत्रेण नतोन्नतभ्रुवा |  १   क
मुखेन विस्फूर्य सुवीरराष्ट्रपं; ततोऽव्रवीत्तं द्रुपदात्मजा पुनः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति