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शल्य पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
ततः श्रुतर्वा सङ्क्रुद्धो धनुराय़म्य साय़कैः |  २३   क
भीमसेनं रणे राजन्वाह्वोरुरसि चार्पय़त् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति