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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २५
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व्राह्मण उवाच
तत्र सामानि गाय़न्ति तानि चाहुर्निदर्शनम् |  १७   क
देवं नाराय़णं भीरु सर्वात्मानं निवोध मे ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति