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वन पर्व
अध्याय २४९
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कोटिकाश्य उवाच
अतीव रूपेण समन्विता त्वं; न चाप्यरण्येषु विभेषि किं नु |  २   क
देवी नु यक्षी यदि दानवी वा; वराप्सरा दैत्यवराङ्गना वा ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति