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वन पर्व
अध्याय २४५
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वैशम्पाय़न उवाच
संविभक्ता च दाता च भोगवान्सुखवान्नरः |  २३   क
भवत्यहिंसकश्चैव परमारोग्यमश्नुते ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति