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वन पर्व
अध्याय २४३
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वैशम्पाय़न उवाच
निहतेषु नरश्रेष्ठ प्राप्ते चापि महाक्रतौ |  १२   क
राजसूय़े पुनर्वीर त्वं मां संवर्धय़िष्यसि ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति