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वन पर्व
अध्याय २४१
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राप्तं त्वय़ा वीर ग्रहणं शत्रुभिर्वलात् |  ५   क
मोक्षितश्चासि धर्मज्ञैः पाण्डवैर्न च लज्जसे ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति