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शान्ति पर्व
अध्याय २४०
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व्यास उवाच
पश्यन्ती भवते दृष्टी रसती रसनं भवेत् |  ५   क
जिघ्रती भवति घ्राणं वुद्धिर्विक्रिय़ते पृथक् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति