शान्ति पर्व  अध्याय २४०

व्यास उवाच

परिद्रष्टा गुणानां स स्रष्टा चैव यथातथम् |  १९   क
सत्त्वक्षेत्रज्ञय़ोरेतदन्तरं विद्धि सूक्ष्मय़ोः ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति