भीष्म पर्व  अध्याय २४

अर्जुन उवाच

गुरूनहत्वा हि महानुभावा; ञ्श्रेय़ो भोक्तुं भैक्षमपीह लोके |  ५   क
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव; भुञ्जीय़ भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति