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विराट पर्व
अध्याय २४
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वैशम्पाय़न उवाच
न हि विद्मो गतिं तेषां वासं वापि महात्मनाम् |  १७   क
पाण्डवानां प्रवृत्तिं वा विद्मः कर्मापि वा कृतम् |  १७   ख
स नः शाधि मनुष्येन्द्र अत ऊर्ध्वं विशां पते ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति