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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीन्महाराजो धृतराष्ट्रोऽम्विकासुतः |  ४   क
गान्धारीं विदुरं चैव समाभाष्य निगृह्य च ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति