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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २४
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नारद उवाच
उभे शुभाशुभे द्वन्द्वं तय़ोर्मध्ये हुताशनः |  १७   क
एतद्रूपमुदानस्य परमं व्राह्मणा विदुः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति