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वन पर्व
अध्याय २३८
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वैशम्पाय़न उवाच
नार्हस्येवङ्गते मन्युं कर्तुं प्राकृतवद्यथा |  ३७   क
विषण्णास्तव सोदर्यास्त्वय़ि प्राय़ं समास्थिते |  ३७   ख
उत्तिष्ठ व्रज भद्रं ते समाश्वासय़ सोदरान् ||  ३७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति