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शान्ति पर्व
अध्याय २३५
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व्यास उवाच
विघसाशी भवेन्नित्यं नित्यं चामृतभोजनः |  ११   क
अमृतं यज्ञशेषं स्याद्भोजनं हविषा समम् |  ११   ख
भृत्यशेषं तु योऽश्नाति तमाहुर्विघसाशिनम् ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति