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वन पर्व
अध्याय २३४
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वैशम्पाय़न उवाच
स गदां वहुधा दृष्ट्वा कृत्तां वाणैस्तरस्विना |  २२   क
संवृत्य विद्ययात्मानं योधय़ामास पाण्डवम् |  २२   ख
अस्त्राणि तस्य दिव्यानि योधय़ामास खे स्थितः ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति