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शान्ति पर्व
अध्याय २३१
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व्यास उवाच
हंसोक्तं चाक्षरं चैव कूटस्थं यत्तदक्षरम् |  ३४   क
तद्विद्वानक्षरं प्राप्य जहाति प्राणजन्मनी ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति