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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २३
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व्राह्मण उवाच
परस्परस्य सुहृदो भावय़न्तः परस्परम् |  २४   क
स्वस्ति व्रजत भद्रं वो धारय़ध्वं परस्परम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति