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वन पर्व
अध्याय २२८
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वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रं ततः सर्वे ददृशुर्जनमेजय़ |  १   क
पृष्ट्वा सुखमथो राज्ञः पृष्ट्वा राज्ञा च भारत ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति