वन पर्व  अध्याय २२६

वैशम्पाय़न उवाच

समस्थो विषमस्थान्हि दुर्हृदो योऽभिवीक्षते |  १७   क
जगतीस्थानिवाद्रिस्थः किं ततः परमं सुखम् ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति