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वन पर्व
अध्याय २२६
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रूय़न्ते हि महाराज सरो द्वैतवनं प्रति |  १२   क
वसन्तः पाण्डवाः सार्धं व्राह्मणैर्वनवासिभिः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति