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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
कृतं मताक्षेण यथा न साधु; साधुप्रवृत्तेन च पाण्डवेन |  २४   क
मय़ा च दुष्पुत्रवशानुगेन; यथा कुरूणामय़मन्तकालः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति