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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रो; दुःशासनश्चापि सुमन्दचेताः |  २१   क
मधु प्रपश्यन्ति न तु प्रपातं; वृकोदरं चैव धनञ्जय़ं च ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति