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आदि पर्व
अध्याय २२४
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वैशम्पाय़न उवाच
लालप्यमानमेकैकं जरितां च पुनः पुनः |  २१   क
नोचुस्ते वचनं किञ्चित्तमृषिं साध्वसाधु वा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति