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वन पर्व
अध्याय २२३
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द्रौपद्यु उवाच
एतद्यशस्यं भगवेदनं च; स्वर्ग्यं तथा शत्रुनिवर्हणं च |  १२   क
महार्हमाल्याभरणाङ्गरागा; भर्तारमाराधय़ पुण्यगन्धा ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति