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शान्ति पर्व
अध्याय २२३
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वासुदेव उवाच
समत्वाद्धि प्रिय़ो नास्ति नाप्रिय़श्च कथञ्चन |  १२   क
मनोनुकूलवादी च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति