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शान्ति पर्व
अध्याय २२२
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भीष्म उवाच
परां गतिं च ये केचित्प्रार्थय़न्ति मनीषिणः |  २२   क
एतद्व्रतं समाश्रित्य सुखमेधन्ति ते जनाः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति