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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
सदा हि ददतां धर्मः सदा चाप्रतिगृह्णताम् |  ३८   क
अर्धं च रात्र्याः स्वपतां दिवा चास्वपतां तथा ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति