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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
नैनानभ्युदिय़ात्सूर्यो न चाप्यासन्प्रगेनिशाः |  ३६   क
रात्रौ दधि च सक्तूंश्च नित्यमेव व्यवर्जय़न् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति