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वन पर्व
अध्याय २२०
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मार्कण्डेय़ उवाच
एका तत्र विशाखस्य घण्टा स्कन्दस्य चापरा |  १९   क
पताका कार्त्तिकेय़स्य विशाखस्य च लोहिता ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति