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वन पर्व
अध्याय २२०
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवमेते पिशाचानामसङ्ख्येय़ा गणाः स्मृताः |  १७   क
घण्टाय़ाः सपताकाय़ाः शृणु मे सम्भवं नृप ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति