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वन पर्व
अध्याय २२०
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मार्कण्डेय़ उवाच
त एते विविधाकारा गणा ज्ञेय़ा मनीषिभिः |  १२   क
तव पारिषदा घोरा य एते पिशिताशनाः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति