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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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भीष्म उवाच
महर्षय़स्तुष्टुवुरञ्जसा च तं; वृषाकपिं सर्वचराचरेश्वरम् |  ११७   क
हिमापहो हव्यमुदावहंस्त्वरं; स्तथामृतं चार्पितमीश्वराय़ ह ||  ११७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति