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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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भीष्म उवाच
भवांस्तु भावतत्त्वज्ञो विद्वाञ्ज्ञानतपोन्वितः |  १०४   क
कालं पश्यति सुव्यक्तं पाणावामलकं यथा ||  १०४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति